विशेष रिपोर्ट: विकास के दावों के बीच प्यासी है गौशाला की झोपड़ी बस्ती, जिम्मेदार मौन

विशेष रिपोर्ट: विकास के दावों के बीच प्यासी है गौशाला की झोपड़ी बस्ती, जिम्मेदार मौन

गौशाला बाजार संवाददाता एक तरफ डिजिटल इंडिया और ‘हर घर नल का जल’ के नारों की गूंज है, तो दूसरी तरफ गौशाला बाजार स्थित गौशाला ओपी के ठीक बगल में बसी झोपड़ी बस्ती आज भी बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है। आजादी के दशकों बाद भी यहाँ के निवासी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।

व्यवस्था पर उठते गंभीर सवाल

बस्ती के निवासियों का कहना है कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि हाथ जोड़कर वोट मांगने तो आते हैं, लेकिन जीत दर्ज करने के बाद इस इलाके की ओर मुड़कर भी नहीं देखते। स्थानीय लोगों ने बताया कि पीने के पानी के लिए उन्हें दूर-दराज के इलाकों या निजी बोरिंग पर निर्भर रहना पड़ता है।

कौन है इस बदहाली का जिम्मेदार?

इस मानवीय संकट के पीछे कई जिम्मेदार चेहरे हैं, जिनकी अनदेखी ने बस्ती को प्यासा रखा है नगर निगम की उदासीनता: शहर के सौंदर्यीकरण पर करोड़ों खर्च करने वाले नगर निगम के पास इस गरीब बस्ती तक पाइपलाइन पहुंचाने का समय नहीं है। जनप्रतिनिधियों की वादाखिलाफी: स्थानीय वार्ड पार्षद और क्षेत्रीय विधायक की निष्क्रियता से लोगों में भारी आक्रोश है। विकास की योजनाएं फाइलों में तो दौड़ रही हैं, लेकिन धरातल पर पानी की एक बूंद भी नहीं पहुंची। प्रशासनिक अनदेखी: PHED विभाग और जिला प्रशासन के पास इस समस्या की कई बार मौखिक शिकायत की गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा बस्ती की महिलाओं का दर्द बस्ती की महिलाओं का कहना है, “हमारा आधा दिन सिर्फ पानी ढोने में बीत जाता है। बच्चों की पढ़ाई और घर का काम सब प्रभावित होता है। क्या हम इस शहर के नागरिक नहीं हैं संपादकीय टिप्पणी: क्या प्रशासन किसी बड़ी बीमारी या जन-आक्रोश का इंतजार कर रहा है? एक तरफ सरकार जल जीवन मिशन का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं पुलिस चौकी ओपी के ठीक नाक के नीचे बसी इस बस्ती का प्यासा रहना पूरी व्यवस्था के गाल पर तमाचा है।

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