वार्ड नंबर 53: चुनावी शोर के बीच ‘ईमानदारी’ की गूँज, लालच पर भारी पड़ रही है सेवा की राजनीति

वार्ड नंबर 53: चुनावी शोर के बीच ‘ईमानदारी’ की गूँज, लालच पर भारी पड़ रही है सेवा की राजनीति

नगर निगम चुनावों की सरगर्मी के बीच वार्ड नंबर 53 का चुनावी रण अब एक दिलचस्प मोड़ पर आ गया है। जहाँ एक तरफ वोट बटोरने के लिए प्रत्याशियों द्वारा ‘शराब, कबाब और नोट’ का सहारा लेने की खबरें आम हैं, वहीं दूसरी ओर एक प्रत्याशी ऐसी भी हैं जिन्होंने इस पारंपरिक चुनावी गंदगी से खुद को दूर रखकर एक नई मिसाल पेश की है। वोट के बदले नोट नहीं, सेवा का संकल्प

स्थानीय नागरिकों के अनुसार, वार्ड के कई प्रत्याशी मतदाताओं को लुभाने के लिए शराब और मुर्गा पार्टियों का आयोजन कर रहे हैं। लेकिन निर्दलीय/पार्षद प्रत्याशी आशा कुमारी की कार्यशैली ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि आशा कुमारी ने चुनाव जीतने के लिए आज तक किसी को एक रुपया भी प्रलोभन के तौर पर नहीं दिया है।

जरूरतमंदों का सहारा, नशा करने वालों से दूरी

वार्ड के जागरूक मतदाताओं ने बताया कि आशा कुमारी का सिद्धांत स्पष्ट है। वे चुनाव के नाम पर फिजूलखर्ची या नशा बांटने के सख्त खिलाफ हैं। हालांकि, उनकी समाज सेवा का तरीका अलग है:

सच्ची सहायता: वे केवल उन परिवारों की मदद करती हैं जिनके घर में राशन-पानी का संकट हो।

नैतिकता: शराब और मुर्गा खाने-खिलाने वाली चुनावी संस्कृति से उन्होंने पूरी तरह दूरी बना रखी है।

मानवीय दृष्टिकोण: चुनाव के समय वोट खरीदने के बजाय, वे चुनाव के बाद भी लोगों की बुनियादी जरूरतों को प्राथमिकता देने का वादा कर रही हैं।

जनता की राय

वार्ड के एक बुजुर्ग मतदाता ने बताया, “बाकी प्रत्याशी रात के अंधेरे में नोट और बोतलें बांट रहे हैं, लेकिन आशा कुमारी ने सच और ईमानदारी का रास्ता चुना है। हमें ऐसे ही प्रतिनिधि की जरूरत है जो हमारे बच्चों का भविष्य न बिगाड़े।”

निष्कर्ष:

वार्ड नंबर 53 का यह चुनाव अब केवल पार्षद चुनने का नहीं, बल्कि ‘नैतिकता बनाम लालच’ का मुकाबला बन गया है। अब देखना यह है कि जनता नोट और नशे को चुनती है या फिर निस्वार्थ सेवा और ईमा नदारी को।

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