महा-खुलासा धनबाद में खाकी और खादी का सबसे बड़ा कॉकटेल IAS-IPS की कप्तानी में फल-फूल रहा है अरबों का अवैध कोयला साम्राज्य।

महा-खुलासा धनबाद में खाकी और खादी का सबसे बड़ा कॉकटेल IAS-IPS की कप्तानी में फल-फूल रहा है अरबों का अवैध कोयला साम्राज्य।

बाघमारा के बाहयरडीह खदान में बीसीसीएल और सीआईएसएफ की हालिया कार्रवाई तो सिर्फ एक बानगी है असली सच इससे कहीं ज्यादा खौफनाक और संस्थागत है। नाम न छापने की शर्त पर सीआईएसएफ CISF की टीम और अंदरूनी प्रशासनिक सूत्रों ने जो इशारा किया है, वह सीधे धनबाद जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक और पुलिस आकाओं की तरफ जाता है। साफ शब्दों में कहें तो धनबाद जिला में अवैध माइनिंग किसी छोटे-मोटे तस्कर के बूते की बात नहीं है यह जिला के आईएएस IAS और आईपीएस IPS अधिकारियों की मूक सहमति, मिलीभगत और ‘कलेक्शन तंत्र’ के संरक्षण में चल रहा अरबों रुपये का संगठित खेल है।
लोकल पुलिस का बायो-डाटा रक्षक ही जब बन जाएं सिंडिकेट के मैनेजर
अगर धनबाद की लोकल पुलिस का कच्चा-चिट्ठा बायो-डाटा खंगाला जाए, तो उनकी कार्यशैली पर गंभीर सवालिया निशान खड़े होते हैं। जनता की सुरक्षा के लिए तैनात लोकल पुलिस का असली चेहरा इस प्रकार है
थाना क्षेत्रों का फिक्स कोटा धनबाद जिला के सोनारडीह ओपी, कतरास, बाघमारा, सिजुआ, लोयबाद, सुदामडीह और लोदना जैसे तमाम कोयला पट्टी वाले थानों का मुख्य काम कानून व्यवस्था संभालना कम और कोयला सिंडिकेट के सुचारू संचालन की निगरानी करना ज्यादा बन चुका है।
कागजी शेर, जमीन पर ढेर लोकल पुलिस का रिकॉर्ड गवाह है कि ये तब तक कोई कार्रवाई नहीं करते, जब तक कि ग्रामीण महिलाएं खुद लाठी लेकर सड़क पर न उतर जाएं या मीडिया का दबाव न बने। कार्रवाई के नाम पर भी सिर्फ अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज कर खानापूर्ति कर दी जाती है।
सीआईएसएफ की बेबसी का फायदा सीआईएसएफ के पास स्थानीय स्तर पर एफआईआर FIR दर्ज करने या अपराधियों को सीधे जेल भेजने की पुलिसिया शक्ति नहीं है। सीआईएसएफ जब भी तस्करों को पकड़ती है, उन्हें लोकल पुलिस के हवाले करना पड़ता है। और लोकल पुलिस ‘ऊपर’ के दबाव और सांठगांठ के कारण कुछ ही घंटों में बैकडोर से इन तस्करों को रफा-दफा कर देती है।
आईएएस-आईपीएस की ‘कप्तानी’ में चल रहा खेल: कैसे काम करता है सिंडिकेट
बिना जिले के शीर्ष अधिकारियों IAS-IPS की जानकारी या शह के, प्रतिदिन हजारों टन कोयला ट्रकों और हाइवा के जरिए जिला और राज्य की सीमाएं पार नहीं कर सकता। सूत्रों के मुताबिक, इस सिंडिकेट का ढांचा बेहद कॉर्पोरेट तरीके से काम करता है
लाइन क्लीयरेंस और एंट्री पास जिले के प्रशासनिक मुखिया IAS और पुलिस कप्तान IPS के अधीन आने वाले परिवहन खनन और पुलिस विभागों की नाक के नीचे से इंट्री फीस के नाम पर अवैध ट्रकों को टोकन जारी किए जाते हैं।
कागजों की बाजीगरी अवैध रूप से उत्खनित कोयले को वैध दिखाने के लिए फर्जी चालान और बंद पड़ी फैक्ट्रियों के नाम पर कागजात तैयार किए जाते हैं। जिला खनन कार्यालय इसमें पूरी तरह आंखें मूंदे रहता है।
दबाव का खेल अगर कोई ईमानदार कनिष्ठ अधिकारी या सीआईएसएफ का जवान मुस्तैदी दिखाता है, तो ट्रांसफर-पोस्टिंग की धमकियों और राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर उसका मुंह बंद कर दिया जाता है। झरिया की भाजपा नेत्री रागिनी सिंह और कांग्रेस के पूर्व मंत्री के बेटे जैसे राजनीतिक चेहरे समय-समय पर इसके खिलाफ बयान तो देते हैं, लेकिन यह प्रशासनिक दीवार इतनी मजबूत है कि जांच की आंच कभी ऊपर तक नहीं पहुंचती।
सबसे बड़ा आर्थिक अपराध झारखंड के युवाओं के रोजगार पर डकैती
इस पूरे खेल का सबसे कड़वा और सुलगता हुआ पहलू यह है कि यह सिंडिकेट सिर्फ कोयले की चोरी नहीं कर रहा, बल्कि झारखंड के भविष्य और यहां के बेरोजगार युवाओं के हक पर डकैती डाल रहा है।
सोचिए, अगर ब्लैक मार्केट में बेचे जा रहे इस अवैध कोयले की सही मात्रा को सरकारी रिकॉर्ड में लाकर सही और वैध तरीके से सही जगह इस्तेमाल किया जाए, तो झारखंड की तस्वीर बदल सकती है। इस वैध राजस्व Revenue के दम पर हर महीने झारखंड में नई-नई कंपनियां स्थापित की जा सकती हैं, नए उद्योग लगाए जा सकते हैं, जिससे स्थानीय आम आदमी और युवाओं को हर महीने हजारों की संख्या में नए रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। झारखंड देश को रोशन करता है, लेकिन यहाँ का युवा रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है। वजह साफ है माफिया पुलिस और प्रशासन का यह त्रिकोण इस राष्ट्रीय संपत्ति का इस्तेमाल राज्य के विकास के लिए होने ही नहीं देना चाहता। ये लोग केवल और केवल अपनी निजी तिजोरियां और जेबें भरने में व्यस्त हैं।
जनता की जान दांव पर, अधिकारियों की तिजोरियां गर्म
इस त्रिकोणीय गठजोड़ माफिया-पुलिस-प्रशासन का खामियाजा धनबाद की गरीब जनता भुगत रही है। बाहयरडीह की खदानों से लेकर झरिया के कतरास मोड़ तक, सुरंगे अब लोगों के घरों और राम मंदिर जैसे आस्था के केंद्रों के नीचे तक खोदी जा चुकी हैं। पूरा धनबाद जिला भू-धंसान और भूमिगत आग की कगार पर खड़ा है।
सीआईएसएफ की टीम ने यह स्वीकार करके कि हमारे हाथ बंधे हैं और लोकल पुलिस की मिलीभगत है यह साफ कर दिया है कि धनबाद में कानून का नहीं, बल्कि कोयला सिंडिकेट का राज चल रहा है।
अब सबसे बड़ा तीखा सवाल राज्य सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसियों से है: क्या धनबाद को इस तबाही से बचाने के लिए इन दागी आईएएस-आईपीएस अधिकारियों और उनके अधीन काम करने वाली लोकल पुलिस के बायो-डाटा की उच्च स्तरीय जांच कराई जाएगी, या धनबाद की जनता को इसी तरह मौत के मुहाने पर जीने और अपनी बर्बादी देखने के लिए छोड़ दिया जाएगा

जोशी न्यूज़ की विशेष खोजी और तीखी ब्यूरो रिपोर्ट

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