राज्य सरकार ने फिर एक बार, मुझे भोगनाडीह जाने से रोकने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। मुझे कल (22

राज्य सरकार ने फिर एक बार, मुझे भोगनाडीह जाने से रोकने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। मुझे कल (22 दिसम्बर) वीर सिदो कान्हू हूल फाउंडेशन द्वारा आयोजित “संथाल परगना स्थापना दिवस” कार्यक्रम में शामिल होना था।

पिछले हूल दिवस (30 जून) के दिन तो उनके पास वहाँ आयोजित हो रहे एक सरकारी कार्यक्रम का बहाना था, लेकिन इस बार वहाँ कोई भी अन्य कार्यक्रम नहीं हो रहा है। फिर भी, सरकार कार्यक्रम को रोकने के लिए हर हथकंडा अपना रही है।

दो हफ्ते तक कार्यक्रम की अनुमति के आवेदन को लटकाने के बाद, कल जिला प्रशासन ने इसके लिए दर्जन भर मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की, कई उल्टी-सीधी शर्तें लगाई, और पूरे प्रशासन को अलर्ट कर दिया कि “खबरदार, किसी भी हालत में यह आयोजन ना होने पाये।”

क्या आपने कभी सुना है कि फुटबॉल के खेल के दौरान मैदान में दो मैजिस्ट्रेट तैनात रहेंगे? क्या आपने कभी देखा है कि आयोजकों को 30 वॉलंटियर की लिस्ट आधार कार्ड के साथ थाने में जमा करनी होगी, अन्यथा आपके कार्यक्रम की अनुमति रद्द हो जायेगी? क्या आपने कभी सुना है कि आपको स्टेडियम से बाहर एक गेट तक बनाने की इजाजत नहीं मिलेगी? यह तानाशाही नहीं, तो क्या है?

जब आप सड़क पर लोगों को चलने ही नहीं देंगे, तो लाखों की भीड़ क्या आसमान से वहां उतरेगी? क्या ट्रैफिक प्रबंधन और नशा मुक्ति अब प्रशासन की नहीं, बल्कि आयोजकों की जिम्मेदारी बन गई है? जुआ-सट्टा रोकना क्या आयोजकों का काम है? फिर पुलिस क्या करेगी? उनका काम क्या सिर्फ निर्दोष आदिवासियों पर लाठी चार्ज और फर्जी मुकदमे दायर करना है?

क्या आपने कभी सुना है कि आयोजक के घर पर मजिस्ट्रेट तैनात रहते हों? क्या किसी भी कार्यक्रम में इतने मजिस्ट्रेट तैनात होते हैं? ऐसे कार्यक्रमों में इतने पुलिस बल की आवश्यकता क्यों है? कुल मिला कर, ट्रैप बिछा दिया गया है, जहां आपके विरोधी पक्ष के लोग और प्रशासन मिल कर कुछ ऐसा करेंगे, जिसे आयोजकों के सिर पर मढ़ कर, फिर से पुलिसिया दमनात्मक कार्रवाई शुरू हो सके।

एक जनप्रतिनिधि के तौर पर, झारखंड के विभिन्न जिलों में तथा राज्य के बाहर भी मैं अक्सर सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होता रहा हूँ। रांची, गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़, देवघर, चाईबासा से लेकर लोहरदगा तक, कहीं कोई समस्या नहीं होती, तो फिर साहिबगंज में क्या दिक्कत है? क्या चम्पाई सोरेन को साहिबगंज जिले में कार्यक्रम करने पर अघोषित रोक है?

नगड़ी आंदोलन से पहले हमने सरकार को ओपेन चैलेंज दिया था कि अगर सरकार में दम हो तो हमको रोक के दिखाए। सरकार ने छह लेयर सिक्योरिटी का इंतजाम किया था, मुझे हाउस अरेस्ट भी किया, लेकिन रिजल्ट क्या हुआ? हजारों लोग वहां गए, हल चलाया और सरकार को पीछे हटना पड़ा।

अगर सरकार वही भाषा, वही तरीका समझती है तो हम आगे से वही तरीका अपनाएंगे। देखते हैं कि कितना एफआईआर होता है और इनके जेलों में कितने लाख लोगों को रखने की जगह है।

आगामी 30 जून 2026 को, हूल दिवस के दिन झारखंड, बंगाल, बिहार एवं ओडिशा से लाखों आदिवासी समाज के लोग रथ के साथ भोगनाडीह पहुंचेंगे। अगर सरकार में ताकत हो, तो हमें रोक के दिखाए।

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