मेयर की कुर्सी मिली पर किस्मत नहीं बदली धनबाद नगर निगम में लापरवाही बरकरार, जनता पूछ रही सिर्फ कुर्सी से प्यार या जनता की भी फिक्र

मेयर की कुर्सी मिली पर किस्मत नहीं बदली धनबाद नगर निगम में लापरवाही बरकरार, जनता पूछ रही सिर्फ कुर्सी से प्यार या जनता की भी फिक्र

धनबाद की जनता ने इस उम्मीद में वोट दिया था कि शहर की सरकार आएगी तो नगर निगम की मनमानी खत्म होगी और समस्याओं का समाधान होगा। महापौर मेयर की कुर्सी तो भर गई, लेकिन नगर निगम की कार्यशैली आज भी खाली और बेजान है। जल कनेक्शन से लेकर जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र तक के लिए जनता आज भी दर-दर भटक रही है। सवाल यह है कि क्या महापौर सिर्फ रस्म अदायगी के लिए चुने गए हैं

 

कुर्सी का मोह या कर्तव्य की कमी जनता के बीच चर्चा तेज है कि महापौर चुनाव जीतने के बाद अब केवल प्रोटोकॉल और कुर्सी के सुख तक सीमित रह गए हैं। नगर निगम के अंचलों में भ्रष्टाचार और लापरवाही का बोलबाला है लेकिन महापौर की ओर से कोई ठोस कार्रवाई या औचक निरीक्षण’ देखने को नहीं मिल रहा।

सिस्टम का पुराना ढर्रा अगर चुनाव के बाद भी लोगों को सिंदरी जैसे अंचलों में ऑपरेटर के न बैठने के कारण वापस लौटना पड़ रहा है, तो यह महापौर की प्रशासनिक पकड़ पर बड़ा सवालिया निशान है। क्या महापौर अधिकारियों के सामने बेबस हैं या वे खुद जनता की तकलीफों से आंखें मूंद चुके हैं

चुनावी वादे बनाम जमीनी हकीकत चुनाव के वक्त जनता को सुविधा और भ्रष्टाचार मुक्त निगम’ का सपना दिखाया गया था। आज साल बीतने को हैं लेकिन पानी के कनेक्शन के लिए फाइलें दफ्तरों की धूल फांक रही हैं।

महापौर महोदय को यह समझना होगा कि जनता ने उन्हें कुर्सी पर इसलिए बैठाया है ताकि वे नगर आयुक्त और लापरवाह अधिकारियों से जनता के हक के लिए लड़ें न कि उनके साथ तालमेल बिठाकर चुप्पी साध लें। अगर जल्द ही पेंडिंग फाइलों और ऑपरेटरों की मनमानी पर लगाम नहीं कसी गई तो जनता इस मौन राजनीति का जवाब देना बखूबी जानती है।

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