पद्म भूषण तो मिल गया पर क्या दिशोम गुरु के विचारों और झारखंड के हक के साथ न्याय हुआ

पद्म भूषण तो मिल गया पर क्या दिशोम गुरु के विचारों और झारखंड के हक के साथ न्याय हुआ
रांची नई दिल्ली


झारखंड आंदोलन के प्रणेता और ‘दिशोम गुरु’ के नाम से विख्यात स्मृति शेष शिबू सोरेन को मरणोपरांत केंद्र सरकार द्वारा पद्म भूषण से अलंकृत किया गया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के हाथों बाबा की जीवनसंगिनी ने यह सम्मान ग्रहण तो कर लिया और सोशल मीडिया पर आभार के संदेशों की बाढ़ भी आ गई लेकिन इस सम्मान के पीछे की कड़वी राजनीतिक सच्चाई और तीखे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सम्मान की टाइमिंग या चुनावी बिसात
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल इसकी टाइमिंग को लेकर उठ रहा है। जो शिबू सोरेन दशकों तक दिल्ली की सत्ता के खिलाफ आदिवासियों के जल जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ते रहे, आज उसी दिल्ली के हुक्मरानों को अचानक उनकी याद क्यों आई जानकार इसे महज एक सम्मान नहीं, बल्कि झारखंड के आदिवासी वोट बैंक को साधने की एक सोची-समझी बिसात मान रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह सम्मान वाकई उनके संघर्षों का आदर है या सिर्फ एक राजनीतिक हेडलाइन बटोरने का जरिया
पद्म भूषण और भारत रत्न का अंतर्विरोध
विज्ञप्ति में साफ कहा गया कि बाबा हमारे लिए भारत के रत्न थे, हैं और रहेंगे। यह वाक्य अपने आप में एक तीखा कटाक्ष है। जब केंद्र सरकार अन्य राज्यों के नेताओं को ताबड़तोड़ भारत रत्न’ से नवाज रही है तो झारखंड के इतने बड़े जननायक को सिर्फ पद्म भूषण तक ही सीमित क्यों रखा गया? क्या झारखंड और आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई को आज भी राष्ट्रीय स्तर पर वह दर्जा नहीं मिल पाया है जिसकी वह हकदार है
सम्मान दिल्ली में पर जमीन पर क्या हालात हैं
दिशोम गुरु ने अपना पूरा जीवन जिस महाजनी व्यवस्था शोषितों और वंचितों के हक के लिए लगा दिया क्या आज का झारखंड वैसा बन पाया है
आज भी राज्य के आदिवासी और मूलवासी अपनी जमीन और अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
कॉरपोरेट कंपनियों द्वारा जल, जंगल और जमीन का दोहन बदस्तूर जारी है।
ऐसे में दिल्ली के वातानुकूलित कमरों में पदक थमा देना और जमीन पर आदिवासियों को उनके अधिकारों से वंचित रखना केंद्र सरकार के दोहरे चरित्र को उजागर करता है।
सत्ता बनाम जनता का दिल यह उन नेताओं पर सीधा हमला है जो आज सत्ता के नशे में चूर हैं। बाबा ने कभी झुकना नहीं सीखा लेकिन आज की राजनीति सिर्फ समझौतों पर टिकी है।
बड़ा सवाल
क्या यह पद्म भूषण सम्मान दिशोम गुरु के संघर्षों की जीत है, या फिर यह दिल्ली की सत्ता का एक ऐसा प्रयास है जिससे वह झारखंड के जलते हुए सवालों और हकों की लड़ाई पर सम्मान का पर्दा’ डाल सके जवाब जनता के पास है क्योंकि बाबा को सम्मान किसी सरकारी पदक से नहीं बल्कि जनता के दिलों से मिला है।

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