भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का शर्मनाक चेहरा: धनबाद के डीएवी उच्च विद्यालय में मौत के साए में पढ़ाई, डीसी महोदय का फोन उठाना तक मुनासिब नहीं

भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का शर्मनाक चेहरा: धनबाद के डीएवी उच्च विद्यालय में मौत के साए में पढ़ाई, डीसी महोदय का फोन उठाना तक मुनासिब नहीं

विशेष संवाददाता, धनबाद।
झारखंड के शिक्षा विभाग में फैले भ्रष्टाचार और धनबाद जिला प्रशासन की संवेदनहीनता का एक बेहद शर्मनाक और खौफनाक चेहरा सामने आया है। सिंदरी और गौशाला बाजार मुख्य मार्ग से सटे टासरा क्षेत्र में स्थित राजकीयकृत डीएवी उच्च विद्यालय का भवन आज एक जीता जागता मौत का कुआं बन चुका है। यहाँ आने वाले मासूम बच्चे हर दिन कलम पकड़ने से पहले अपनी जान हथेली पर रखने को मजबूर हैं, लेकिन व्यवस्था के ठेकेदारों की आँखों का पानी पूरी तरह मर चुका है।
पत्रकार नरेंद्र जोशी, जिनका स्वयं का बच्चा इसी स्कूल में पढ़ता है, ने अपनी आँखों से जो देखा वह रूह कंपा देने वाला है। आज दिन के 11 बजकर 40 मिनट पर जब उन्होंने धनबाद के जिला उपायुक्त महोदय को फोन लगाकर इस विकट और जानलेवा स्थिति की जानकारी देनी चाही, तो महोदय ने फोन उठाना भी मुनासिब नहीं समझा। यह सीधा संकेत है कि जिम्मेदारों को गरीबों के बच्चों की सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं है। एक तरफ स्कूल में करंट दौड़ रहा है और बच्चे मौत के साए में हैं, और दूसरी तरफ जिला प्रशासन के मुखिया के पास फोन सुनने का वक्त तक नहीं है।
आज सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यह उठता है कि क्या झारखंड सरकार के किसी बड़े नेता, शिक्षा विभाग के किसी आला अधिकारी या धनबाद के जिला उपायुक्त का एक भी बच्चा इन बदहाल सरकारी स्कूलों में पढ़ता है जवाब है बिल्कुल नहीं। इन रसूखदार अधिकारियों के बच्चे आलीशान और सुरक्षित निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, यही वजह है कि इन्हें गरीब परिवारों के बच्चों की जान की कोई परवाह नहीं है। इस घोर लापरवाही के लिए सीधे तौर पर झारखंड सरकार की लचर नीतियां और धनबाद के उपायुक्त की प्रशासनिक नाकामी जिम्मेदार है, जो जमीन पर उतरकर स्कूलों का निरीक्षण करने के बजाय सिर्फ बंद कमरों से कागजी आदेश जारी करते हैं।
स्कूल की तीसरी कक्षा और उसके आसपास के कमरों की हालत इतनी जर्जर हो चुकी है कि छत का प्लास्टर और कंक्रीट का हिस्सा लगातार भरभराकर नीचे गिर रहा है। इस मानसूनी बारिश में छत और खिड़कियों से पानी इस कदर रिस रहा है कि पूरा क्लासルーム तालाब बन गया है। सबसे ज्यादा रूह कंपा देने वाली बात यह है कि छतों से बहते पानी के कारण पूरे कमरे की दीवारों और बिजली के बोर्ड में जानलेवा करंट दौड़ रहा है। मासूम बच्चे गीली बेंचों पर बैठकर थर थर कांप रहे हैं कि कब कहां से उन्हें करंट लग जाए या कब जर्जर छत उनके ऊपर जमींदोज हो जाए।
इस भयावह स्थिति ने शिक्षा विभाग के दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। स्थानीय जनता और अभिभावकों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। लोगों का सीधा आरोप है कि शिक्षा विभाग के आला अधिकारी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं और मोटी तनख्वाह लेकर कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं। इन संवेदनहीन अधिकारियों ने गरीब परिवारों के बच्चों को कीड़ा मकोड़ा समझ लिया है, जिनकी जान की कीमत इनकी नजर में कुछ भी नहीं है। जब स्कूल में करंट उतर रहा है और छत कभी भी गिर सकती है, तब भी इन लापरवाह अफसरों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। क्या प्रशासन यहाँ किसी मासूम की लाश गिरने का इंतजार कर रहा है
पढ़ाई के मंदिर को अपनी लापरवाही से श्मशान में तब्दील करने वाले इन भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई कानूनी कार्रवाई न होना झारखंड सरकार की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। नौनिहालों का भविष्य यहाँ पूरी तरह अंधकार में है और वे हर पल खौफ के साए में जी रहे हैं। क्षेत्र के आक्रोशित नागरिकों ने अब मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री से आर पार की मांग की है। जनता का साफ कहना है कि बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले इन दोषी और लापरवाह अधिकारियों को तुरंत सस्पेंड कर उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए और युद्ध स्तर पर स्कूल भवन का जीर्णोद्धार कराया जाए।

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