सिस्टम के प्रेशर से डिप्रेशन फोन कॉल्स और पब्लिक के दबाव से तंग आकर गायब हुई महिला बीएलओ, पुलिस और पत्रकारों की टीम ने खोज निकाला

सिस्टम के प्रेशर से डिप्रेशन फोन कॉल्स और पब्लिक के दबाव से तंग आकर गायब हुई महिला बीएलओ, पुलिस और पत्रकारों की टीम ने खोज निकाला

धनबाद के गौशाला बाजार

सरकारी नीतियों की विसंगतियां और जमीनी स्तर पर काम का बेतहाशा दबाव किस तरह कर्मचारियों की मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है, इसकी एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। जनता के अंतहीन सवालों, अधिकारियों के दबाव और चौबीसों घंटे बजती मोबाइल की घंटियों से तंग आकर एक महिला बीएलओ इस कदर डिप्रेशन में चली गईं कि उन्होंने दुनिया से संपर्क काट कर खुद को गायब कर लेना ही मुनासिब समझा। यह पूरी कहानी गौशाला ओपी क्षेत्र के बीआईटी सुपर फास्फेट कॉलोनी की रहने वाली सैंतालीस वर्षीय आंगनवाड़ी सेविका सह बीएलओ पंकज मनी की है, जिनके पति का नाम रामभवन प्रसाद है।

मंगलवार की दोपहर पंकज मनी सभी बीएलओ की बैठक में शामिल होने गई थीं, लेकिन देर शाम तक जब वे घर नहीं लौटीं और उनका मोबाइल भी लगातार बंद आने लगा, तो परिजनों की चिंता बढ़ गई। लापता बीएलओ के बड़े पुत्र ने बिना वक्त गंवाए गौशाला ओपी में लिखित शिकायत दर्ज कराई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए गौशाला ओपी प्रभारी शंभू नाथ सिंह ने तुरंत मोर्चा संभाला और मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर डाला।

इस खोजबीन अभियान में पुलिस के साथ-साथ स्थानीय पत्रकार भी सक्रिय रूप से शामिल रहे। पुलिस, पत्रकारों और लापता पंकज मनी के बड़े पुत्र की एक संयुक्त टीम ने उस हर संभावित स्थान पर छानबीन की जहां सर्विलांस में लोकेशन मिला। पुलिस की टीम ने रात नौ बजे से लेकर ग्यारह बजे तक उस आंगनवाड़ी केंद्र में सघन तलाशी ली, जहां पंकज मनी तैनात हैं। इसके बाद टीम ने नॉटुंडी बस्ती पहुंचकर उनके साथ काम करने वाली रसोइयों और सहायिकाओं के घरों पर भी पूछताछ की। अंततः सर्विलांस में लोकेशन झरिया मिलने के बाद पुलिस और पत्रकारों की टीम ने अगले दिन सुबह उन्हें एक रिश्तेदार के घर से सकुशल बरामद कर लिया।

थाने में ओपी प्रभारी और अपने बड़े बेटे के सामने पंकज मनी ने रोते हुए अपनी पीड़ा बयां की। उन्होंने बताया कि पब्लिक और ऊपर के अधिकारियों के इतने फोन आते हैं कि उनका दिमाग काम करना बंद कर चुका था। काम का इतना प्रेशर है कि अगर शाम को थक-हार कर अपने बीआईटी सुपर फास्फेट कॉलोनी स्थित घर जाती हैं, तो वहां भी लोग काम लेकर चौखट पर आ धमके रहते हैं। दिन-भर सिर्फ फोन की घंटियां बजती रहती हैं। इस लगातार मानसिक प्रताड़ना से वे डिप्रेशन में चली गईं और मन शांत करने के लिए ही उन्होंने अपना मोबाइल बंद किया और रिश्तेदार के घर चली गई थीं।

इस पूरे मामले की पड़ताल करने पर सरकारी तंत्र का एक बहुत बड़ा विरोधाभास सामने आया है, जो जनता और बीएलओ दोनों की परेशानी का सबब बना हुआ है। केंद्र सरकार ने जनता की सुविधा के लिए एनवीएसपी पोर्टल पर खुद से ऑनलाइन एसआईआर करने की बेहद सुलभ सुविधा दी है। जो लोग खुद ऑनलाइन करने में असमर्थ हैं, वे अपने नजदीकी प्रज्ञा केंद्र यानी सीएससी में जाकर इसे करवा सकते हैं।

इस पारदर्शी राष्ट्रीय व्यवस्था के विपरीत, धनबाद क्षेत्र में एसडीओ का सख्त आदेश है कि प्रज्ञा केंद्रों से ऑनलाइन एसआईआर नहीं करना है। स्थानीय प्रशासन का तर्क है कि चूंकि एसआईआर का कोई सरकारी शुल्क नहीं है और यह सेवा पूरी तरह मुफ्त है, इसलिए इसे प्रज्ञा केंद्रों से नहीं कराया जाएगा।

प्रशासन के इस आदेश ने पूरी व्यवस्था को एक अंधे कुएं में धकेल दिया है। प्रज्ञा केंद्र संचालकों का कहना है कि दुकान का किराया, भारी-भरकम बिजली बिल, इंटरनेट चार्ज और कंप्यूटर प्रिंटर का मेंटेनेंस उन्हें अपनी जेब से देना पड़ता है। प्रिंटिंग मशीन या कंप्यूटर खराब होने पर एक बार में कम से कम एक हजार रुपये का खर्च आता है। जब सरकार और स्थानीय प्रशासन की तरफ से कोई न्यूनतम चार्ज तय ही नहीं है, तो वे मुफ्त में अपनी जेब से पैसे लगाकर काम कैसे कर सकते हैं।

नतीजा यह है कि प्रज्ञा केंद्र इन कार्यों से पीछे हट जाते हैं और सारा का सारा दबाव अकेले बीएलओ के कंधों पर आ जाता है, जो पहले से ही आंगनवाड़ी के कामों के बोझ तले दबी होती हैं। जनता को यह समझ नहीं आता कि जब भारत सरकार ने ऑनलाइन की सुविधा दी है, तो स्थानीय अधिकारी इस पर रोक क्यों लगा रहे हैं। वे काम न होने पर सीधे बीएलओ का घेराव करते हैं और उनके निजी नंबर पर फोन कर-करके उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित करते हैं।

इस गंभीर प्रशासनिक और मानसिक संकट से कर्मचारियों को बचाने, प्रज्ञा केंद्रों को राहत देने और जनता को परेशानी से बचाने का केवल एक ही व्यावहारिक रास्ता नजर आता है। स्थानीय प्रबुद्ध जनता का मानना है कि इस मानसिक तनाव और असमंजस की स्थिति को खत्म करने के लिए सरकार को प्रज्ञा केंद्रों पर इन डिजिटल सेवाओं के लिए एक न्यूनतम और निश्चित सेवा शुल्क तय कर देना चाहिए।

अगर सरकार एक छोटा सा अमाउंट फिक्स कर देती है, तो प्रज्ञा केंद्र संचालक भी जिम्मेदारी के साथ काम करेंगे। इससे जनता को भी इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा, बीएलओ पर से काम का अतिरिक्त और जानलेवा मानसिक बोझ खत्म होगा, और सरकार का डिजिटल इंडिया का मिशन भी बिना किसी कर्मचारी को डिप्रेशन में डाले आसानी से पूरा हो सकेगा। अब देखना यह है कि धनबाद जिला प्रशासन इस व्यावहारिक समस्या को सुलझाने के लिए क्या कदम उठाता है।

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